छोटा जादूगर?
कक्षा 10 हिंदी वैकल्पिक अध्याय 2 कार्निवाल के मैदान में बिजली जगमग आ रही थी मैं खड़ा था फव्वारे के पास , जहां एक लड़का चुपचाप शरबत पीने वालों को देख रहा था। उसके गले में फटे कुर्ते के ऊपर से एक मोटी सी सूत की रस्सी पड़ी थी और जेब में ताश के पत्ते थे। उसके मुख पर गंभीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी और ना जाने क्यों आकर्षित हुआ
मैंने पूछा क्यों जी तुमने इसमे क्या देखा ?
"मैंने सब देखा है। यहां चूड़ी सकते हैं। खिलौने पर निशाने लगाते हैं। मुझे तो खिलाने पर निशाना लगाना अच्छा मालूम हुआ। जादूगर तो बिल्कुल निकम्मा है उससे अच्छा तो ताश का खेल में दिखा सकता हूं। उसमें बड़ी प्रगल्भता से कहा।
मैंने पूछा और उस पर्दे में क्या है? वहां तुम नहीं गई थी?
नहीं', वहां मैं नहीं जा सकता। टिकट लगता है। मैंने कहा तो चलो मैं वहां तुमको लीवा चलु । उसने कहा, वहां जाकर क्या कीजिएगा ? चलिए निशाना लगाया जाए" मैंने उससे सहमत होकर कहां तो फिर चलो पहले शरबत पी लिया जाए हम दोनों शरबत पीकर निशाना लगाने चले राह में ही उससे पूछा तुम्हारे और कौन-कौन है "मां बाबूजी" उन्होंने तुमको यहां आने के लिए मना नहीं किया
बाबूजी जेल में है क्यों?
देश के लिए गर्व से बोला और तुम्हारी मां बीमार है और तुम तमाशा देख रहे हो उसके मुंह पर तिरस्कार की हंसी फूट पड़ी उसने कहा तमाशा देखने नहीं दिखाने आया हूं कुछ पैसे ले जाऊंगा तो मां को पथ्य दूंगा मुझे शरबत ना पीना कर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती।
मैं आश्चर्य से उस तेरह-चौदह वर्ष के बालक को देखने लगा हां मैं सच कहता हूं बाबूजी मां बीमार है इसलिए मैं नहीं गया कहां जेल में सब कुछ लोग खेल तमाशा देखते ही है तो मैं क्यों ना दिखाकर मां की दवा करूं और अपना पेट भरूं मैंने उससे कहा अच्छा चलो निशाना लगाया जाए हम दोनों उस जगह पर पहुंचे, जहां खिलौनों को खिलोनों को गेंद से गिराया जाता था। मैंने 12 टिकट खरीद कर उस लड़के को दिए।
वह निकला पक्का निशानेबाज, उसकी कोई गेंद खाली नहीं गई। देखने वाले दंग रह गए उसने 12 खिलौनों को बटोर लिया लेकिन उठाता कैसे कुछ मेरे रुमाल में बांधे कुछ जेब में रख ली ये कोलकाता के सुरम्य बॉटनिकल उद्यान में लाल कमलिनी से भरी हुई एक छोटी झील के किनारे के किनारे घने वृक्षों की छाया में अपनी मंडली के साथ बैठा हुआ में जलपान कर रहा था इतने में वही छोटा जादूगर दिखाई पड़ा
मस्तानी चाल से झूमता हुआ कर कहने लगा बाबू जी नमस्ते आज का यह तो खेल दिखाऊं नहीं जी अभी हम लोग जलपान कर रहे हैं फिर इसके बाद क्या गाना बजाना होगा बाबूजी नहीं जी तुमको मैं क्रोध से कुछ और कहने जा रहा था श्रीमती जी ने कहा दिखलाओ जी तुम तो अच्छे आए।
भला कुछ मन तो वह लाए मैं चुप हो गया क्योंकि श्रीमती की वाणी मैं मां की सी वहां मिठास थी जिसके समान किसी भी लड़के को रोका नहीं जा सकता उसने खेल आरंभ किया उस दिन कार्निवाल केशव खिलौने उसके खेल में अपना अभिनय करने लगे बिल्ली रोने लगी भालु मानने लगा बंदर घुड़कने लगा गुड़िया का ब्याह हुआ गुड्डा वर काला निकला लड़के की वाचालता से ही अभिनय हो रहा था
सब हंसते हंसते लोटपोट हो गए ताश के पत्ते लाल हो गए फिर सब काले हो गए गले की सूट की डोरी टुकड़े-टुकड़े होकर फिर जुड़ गई लट्टू अपने आप नाच रहे थे मैंने कहा अब हो चुका अपना खेल बटोर लो हम लोग भी अब जाएंगे श्रीमती जी ने धीरे से ₹1 दे दिया वहां उछल पड़ा मैंने कहा लड़के छोटा जादूगर कहिए या मेरा नाम है
इसी से मेरी जीविका है मैं कुछ बोलना ही चाहता था कि श्रीमती जी ने कहा अच्छा तुम इससे क्या करोगे पहले भरपेट पकौड़ी खा लूंगा फिर एक सूती चादर लूंगा मेरा क्रोध अब लौट आया मैं अपने आप पर बहुत क्रोधित होकर सोचने लगा ओहो कितना स्वार्थी हूं मैं उसके ₹1 पाने पर ऐसा करने लगा था ना वह नमस्कार करके चला गया हम लोग कुंज देखने के लिए चले
रह रह कर भी छोटा जादूगर का स्मरण होता था 1 दिन सचमुच वाह झोपड़ी के पास चादर कंधे पर डाले खड़ा था मैंने मोटर रोककर उससे पूछा तुम यहां कहां मेरी मां यही है ना अब उसे अस्पताल वालों ने निकाल दिया मैं उतर गया उस झोपड़ी में देखा तो एक स्त्री चित्र से लदी हुई कांप रही थी छोटे जादूगर ने कम्बल ऊपर डाल कर उसके शरीर से लपेटे हुए कहा मां मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े
एक दिन कोलकाता के उस उद्यान को फिर देखने की इच्छा से मैं अकेला ही चल पड़ा 10:00 बज चुके थे मैंने देखा कि उस निर्मल धूप में सड़क के किनारे एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंग मंच सजा था
मोटर रोककर उतर पड़ा बिल्ली रूठ रही थी ब्याह की तैयारी थी पर यह सब होते हुए भी जादूगर की वाणी मैं प्रसन्नता की तरी नहीं थी मानो रो ही रो रहे थे मैं आश्चर्य से देख रहा था फेल हो जाने पर पैसा बटोर कर उसने भीड़ में से मुझे देखा वह जैसे क्षणभर के लीये स्फुरतिमान हो गया
मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए पूछा आज तुम्हारा खेल जमा क्यों नहीं मां ने कहा था कि आज तुरंत चले आना मेरी घड़ी समीप है अविचल भाव से उसने कहा तब भी तुम खेल दिखाने चले आए मैंने क्लोज से कहा उसने कहा क्यों नहीं आता और कुछ कहने मैं जैसे वहां अपमान का अनुभव कर रहा था क्षणभर में मुझे अपनी भूल मालूम हो गई उसके झुले को
गाड़ी में फेंक कर उसे भी उठाते हुए कहां जल्दी करो मोटर वाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा कुछ ही मिनटों में झोपड़े के पास पहुंचा जादूगर दौड़ कर मां मां पुकारते हुए
झोपड़े के अंदर घुसा मैं भी पीछे था किंतु स्त्री के मुंह में से बे,,,,, निकल कर रह गया उसके दुर्बल हाथ उठकर रह गए जादूगर उससे लिपट कर रो रहा था मैं स्तब्ध था उस उज्जवल धूप में समग्र संसार जैसे जादू सा मेरे चारों और रति करने लगा
